दिल्ली में पूर्व छात्र छात्राओं का राष्ट्रीय सम्मेलन, गुरुकुल की विरासत, प्रशासन और संपत्तियों को लेकर उठे गंभीर प्रश्न

विशेष संवाददाता
नई दिल्ली, 19 जुलाई।
एक समय राष्ट्रभक्ति, वैदिक शिक्षा और महिला सशक्तिकरण का पर्याय रहा कन्या गुरुकुल महाविद्यालय, 60 राजपुर रोड, देहरादून आज अपने अस्तित्व और भविष्य को लेकर गंभीर बहस के केंद्र में है। राजधानी दिल्ली के आर्य समाज मंदिर, बी-2, सफदरजंग एन्क्लेव में आयोजित स्नातिका संघ ट्रस्ट के राष्ट्रीय सम्मेलन में देशभर से पहुंचीं पूर्व छात्राओं, शिक्षाविदों, आर्य समाज के प्रतिनिधियों तथा समाजसेवियों ने संस्थान की वर्तमान स्थिति पर गहन विचार-विमर्श किया। jसम्मेलन में गुरुकुल की ऐतिहासिक विरासत, प्रशासनिक व्यवस्था, शैक्षणिक वातावरण तथा संपत्तियों के संरक्षण से जुड़े अनेक मुद्दे प्रमुखता से उठाए गए।

कार्यक्रम की अध्यक्षता स्नातिका संघ की अध्यक्ष डा. शीला डागा ने की जबकि संचालन स्नातिका संघ की सचिव विदुषी योगाचार्या रीता गुप्ता ने किया। सम्मेलन में इन्दु डोबरियाल, डॉ. रिचा चौधरी, विदुषी मधु अग्रवाल, डॉ. साधना त्यागी,मृदुला ,एडवोकेट मीनू ,नीलू बार्बी ,ठाकुर विक्रम सिंह, आर्य रविदेव गुप्त, डॉ. सुमेधा, साध्वी उत्तमायति, जितेन्द्र भाटिया, दीनदयाल उपाध्याय, डॉ. धनंजय, देवेन्द्र शास्त्री, डॉ. देवेष, आचार्य जितेन्द्र, राजीव उपाध्याय, आरती खुराना सहित विभिन्न राज्यों से आए अनेक गणमान्य व्यक्ति उपस्थित रहे। सम्मेलन में बताया गया कि गुरुकुल के संरक्षण और पुनरुद्धार के उद्देश्य से गठित स्नातिका संघ से अब लगभग 250 पूर्व छात्राएं जुड़ चुकी हैं।
सम्मेलन की शुरुआत गुरुकुल आंदोलन के इतिहास के स्मरण से हुई। वक्ताओं ने कहा कि गुरुकुल कांगड़ी विश्वविद्यालय, हरिद्वार की स्थापना वर्ष 1902 में स्वामी दयानंद सरस्वती के प्रखर शिष्य स्वामी श्रद्धानंद ने भारतीय संस्कृति, वैदिक ज्ञान और राष्ट्र निर्माण के उद्देश्य से की थी। उस समय अंग्रेजी शिक्षा व्यवस्था के बढ़ते प्रभाव के बीच स्वामी श्रद्धानंद ने भारतीय जीवन मूल्यों पर आधारित वैकल्पिक शिक्षा प्रणाली की शुरुआत की, जिसने आगे चलकर राष्ट्रीय चेतना के निर्माण में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।

‘स्वामी श्रद्धानंद ने त्याग से खड़ा किया था गुरुकुल’
अपने विस्तृत संबोधन में रीता गुप्ता योगाचार्या ने कहा कि गुरुकुल कांगड़ी केवल एक शिक्षण संस्थान नहीं बल्कि एक राष्ट्रीय आंदोलन था। उन्होंने कहा कि यहां से अनेक ऐसे स्नातक और स्नातिकाएं निकले जिन्होंने स्वतंत्रता आंदोलन, सामाजिक सुधार और राष्ट्र निर्माण में महत्वपूर्ण योगदान दिया। उन्होंने कहा कि उस समय अंग्रेजों के बीच यह धारणा प्रचलित थी कि “स्वामी श्रद्धानंद यहां बम नहीं, बल्कि देशभक्त तैयार करते हैं।”
रीता गुप्ता ने कहा कि स्वामी श्रद्धानंद ने गुरुकुल की स्थापना के लिए अभूतपूर्व त्याग किया। उनके अनुसार संस्थान के निर्माण और संचालन के लिए उन्होंने अपनी पत्नी के आभूषण तक बेच दिए और अपने बच्चों के लिए कोई निजी संपत्ति नहीं छोड़ी। उन्होंने कहा कि उनका पूरा जीवन समाज और शिक्षा के लिए समर्पित रहा और गुरुकुल उसी त्याग और राष्ट्रसेवा की भावना का प्रतीक है।

स्नातिकाओ ने कहा कि कन्या गुरुकुल महाविद्यालय, 60 राजपुर रोड, देहरादून गुरुकुल कांगड़ी का एक महत्वपूर्ण परिसर है जिसकी स्थापना विशेष रूप से बालिकाओं की शिक्षा के लिए की गई थी। इसके अतिरिक्त गुरुकुल कांगड़ी के अंतर्गत पांच विद्यालय तथा एक फार्मेसी भी संचालित होती है। उन्होंने कहा कि आपसी मतभेदों के चलते आयुर्वेदिक कॉलेज गुरुकुल व्यवस्था से अलग हो गया, जिसे उन्होंने संस्थान के लिए बड़ी क्षति बताया।
प्रबंधन व्यवस्था पर लगाए गंभीर आरोप
स्नातिकाओं ने अपने संबोधन में कहा कि स्वामी श्रद्धानंद द्वारा गुरुकुल के उत्थान और संचालन के लिए गठित सभाएं आज अपने मूल उद्देश्य से भटक गई हैं। उन्होंने आरोप लगाया कि वर्षों से ये संस्थाएं आपसी न्यायिक विवादों में उलझी हुई हैं जबकि उनका उद्देश्य गुरुकुल का विकास और संरक्षण होना चाहिए था।

उन्होंने कहा कि गुरुकुल की संपत्तियां समाज द्वारा दान में प्राप्त हुई हैं। इसलिए इन संपत्तियों को न तो बेचा जा सकता है और न ही किसी व्यक्ति की निजी संपत्ति माना जा सकता है। उन्होंने आरोप लगाया कि संबंधित सभाओं में प्रत्येक पांच वर्ष में चुनाव कराने का स्पष्ट प्रावधान होने के बावजूद लंबे समय से नियमित चुनाव नहीं हुए। उन्होंने यह भी दावा किया कि नियमों में मनमाने परिवर्तन किए गए तथा पूर्व छात्राओं, अभिभावकों और आर्य समाज के विद्वानों की भूमिका लगातार सीमित की गई।
स्नातिकाओ ने आरोप लगाया कि देहरादून स्थित कन्या गुरुकुल महाविद्यालय परिसर का निरीक्षण कराने के लिए हरिद्वार के एक प्रसिद्ध वैद्य को ले जाया गया, जिसे उन्होंने परिसर को बेचने की कथित तैयारी से जोड़ा। उन्होंने यह भी दावा किया कि परिसर के पीछे के एक हिस्से पर स्थानीय लोगों को कथित रूप से अवैध रूप से कब्जा दिलाया गया। इन आरोपों पर सम्मेलन में संबंधित पक्ष की प्रतिक्रिया उपलब्ध नहीं कराई गई।
उन्होंने कहा कि यदि समय रहते समाज आगे नहीं आया तो गुरुकुल की ऐतिहासिक पहचान और उसका मूल उद्देश्य गंभीर संकट में पड़ सकता है।
‘गुरुकुल की भूमि और विरासत से समझौता नहीं होगा’
सम्मेलन की अध्यक्ष डा. शीला डागा ने कहा कि कन्या गुरुकुल महाविद्यालय योग्य विदुषी आचार्यों की कमी से जूझ रहा है, जिसका प्रभाव शिक्षा की गुणवत्ता पर पड़ रहा है। उन्होंने आरोप लगाया कि कुछ भू-माफिया संस्थान की बहुमूल्य भूमि पर नजर लगाए हुए हैं और गुरुकुल की मूल भावना को कमजोर करने का प्रयास किया जा रहा है।

उन्होंने कहा कि स्नातिका संघ किसी भी परिस्थिति में गुरुकुल की भूमि, उसकी ऐतिहासिक विरासत और उसके मूल उद्देश्यों से समझौता नहीं करेगा। उन्होंने पूर्व छात्राओं से संगठित होकर गुरुकुल बचाओ आंदोलन को राष्ट्रीय स्तर तक पहुंचाने का आह्वान किया।
‘अंतिम सांस तक संघर्ष जारी रहेगा’
डा. रिचा चौधरी ने सम्मेलन को सफल बताते हुए कहा कि देशभर से पूर्व छात्राओं का एक मंच पर एकत्र होना इस बात का प्रमाण है कि गुरुकुल आज भी लाखों लोगों की आस्था, संस्कार और भावनाओं से जुड़ा हुआ है। उन्होंने कहा, “हम अंतिम सांस तक गुरुकुल को सुरक्षित हाथों में वापस लाने के लिए हर संभव प्रयास करेंगे। गुरुकुल सदैव नैतिकता, संस्कार और प्रेरणा का प्रतीक रहा है तथा आने वाली पीढ़ियों के लिए भी मार्गदर्शक बना रहेगा।”

उन्होंने कहा कि यह केवल एक संस्थान की लड़ाई नहीं बल्कि उस शिक्षा दर्शन को बचाने का प्रयास है जिसने समाज को चरित्रवान नागरिक दिए।
‘नियम हैं लेकिन उनका पालन नहीं हो रहा’
विदुषी मधु अग्रवाल ने कहा कि ऐतिहासिक गुरुकुल को स्थापित हुए एक शताब्दी से अधिक समय बीत चुका है। उन्होंने कहा कि संस्थान के पास स्पष्ट नियम और विनियम मौजूद हैं, लेकिन वर्तमान व्यवस्था उन निर्धारित मानकों के अनुरूप संचालित नहीं हो रही है। उन्होंने कहा कि यदि गुरुकुल को उसके मूल संविधान और आदर्शों के अनुरूप नहीं चलाया गया तो उसकी पहचान धीरे-धीरे समाप्त हो जाएगी।
‘महिला शिक्षा की जड़ों को कमजोर करने की कोशिश’
दिल्ली विश्वविद्यालय के श्यामा प्रसाद मुखर्जी कॉलेज की पूर्व प्राचार्य डॉ. साधना त्यागी ने कहा कि गुरुकुल केवल भवनों का समूह नहीं बल्कि भारतीय संस्कृति और महिला शिक्षा का सशक्त प्रतीक है। उन्होंने कहा कि यदि ऐसे संस्थानों की उपेक्षा की गई तो इसका प्रभाव आने वाली पीढ़ियों पर पड़ेगा। उन्होंने समाज से एकजुट होकर गुरुकुल की ऐतिहासिक धरोहर की रक्षा करने का आह्वान किया।

सम्मेलन के अंत में स्नातिका संघ ने गुरुकुल की शैक्षणिक गुणवत्ता में सुधार, प्रशासनिक पारदर्शिता, नियमित चुनाव, ऐतिहासिक विरासत के संरक्षण तथा संस्थान की संपत्तियों की सुरक्षा के लिए राष्ट्रीय स्तर पर जनजागरण अभियान चलाने का निर्णय लिया। वक्ताओं ने कहा कि गुरुकुल किसी व्यक्ति या समूह की नहीं बल्कि पूरे समाज की धरोहर है और उसके संरक्षण की जिम्मेदारी भी पूरे समाज की है। सम्मेलन का समापन इस संकल्प के साथ हुआ कि “गुरुकुल बचाओ आंदोलन” को देशव्यापी स्वरूप दिया जाएगा ताकि स्वामी श्रद्धानंद के त्याग, वैदिक शिक्षा की परंपरा और कन्या गुरुकुल महाविद्यालय जैसी ऐतिहासिक संस्थाओं की गरिमा और अस्तित्व सुरक्षित रह सके।



